एक परिचय
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by Rishabh Makrand
अपना परिचय देने से पहले मैं अपने जन्म के बारे मे बता दूँ, क्योकि परिचय तो अनजानों को दिया जाता है..मैं तो आपकी हुँ..आपकी अपनी,
कैसे..
अरे बता दूँगी..चलो एक कहानी से शुरु करते हैं..
तो हुआ युँ कि जब ब्रम्हा जी ने सॄष्टी कि रचना कि तो सोचा कि अब तो सब बना ही दिया है.. सब चलता रहेगा..थोडा आराम कर लिया जाये..लेकिन जाते जाते उन्होने सोचा कि एक नज़र तो डाल लें कि सब चल कैसा रहा है..
देखा कि सब आराम से पडे हुए हैं, कोई गती ही नहीं है..सब जडवत हैं..अब तो उन्हे चिंता हो गयी, इतनी मेहनत से रचना कि लेकीन अभिकल्पना पे पानी फ़िरता नजर आ रहा था.
अब क्या करें, थोडी देर दिमाग लगाया किंतु कुछ समझ नहीं आया..
फ़िर उन्होने अभीयंता विश्वकर्मा को बुलाया और पुछा कि ये जो मैने रचना कि है इतनी मेहनत से इसमें क्या त्रुटी रह गयी है, कुछ काम क्यों नहीं कर रहा..
विश्वकर्मा ने निरिक्षण-परिक्षण किया फिर कहा कि प्रभु इन प्राणीयों मे कोई ऐसा यंत्र नहीं है जो इन्हे कार्य करने के लिये उद्वित करे सो कुछ ऐसा यंत्र लगाईये कि सब उस यंत्र के प्रभाव से काम करना शुरु करें,
ब्रम्हा ने कहा तुम ही कोइ सुझाव दो..
फिर विश्वकर्मा ने मुझे बना कर सभी प्राणीयों मे लगा दिया.
कुछ ही क्षण बिते होंगे कि सम्पुर्ण जगत चलायमान हो गया..
आशा है कि आप अब तक मुझे पहचान गये होंगे..
जी, मैं हूँ आपकी अपनी भुख,चाहो जिस संज्ञा से सम्बोधित कर लो..
सोच के देखो, आज जो भी हो रहा है, या कहो कि होता है, या होता आ रहा है, कही न कही से मैं ही उसकी कारक हूँ,
सुकर्म से लेके दुस्कर्म तक, सभी कारणों का कारक मैं ही हुँ..
गण से गणतंत्र तक सभी मेरे प्रभाव से प्रभावित हैं..
अपने विषय मे कुछ और तथ्यों को ले कर मै जल्द ही प्रस्तुत होउँगी,
तब तक के लिये आज्ञा दें
-ॠ
कैसे..
अरे बता दूँगी..चलो एक कहानी से शुरु करते हैं..
तो हुआ युँ कि जब ब्रम्हा जी ने सॄष्टी कि रचना कि तो सोचा कि अब तो सब बना ही दिया है.. सब चलता रहेगा..थोडा आराम कर लिया जाये..लेकिन जाते जाते उन्होने सोचा कि एक नज़र तो डाल लें कि सब चल कैसा रहा है..
देखा कि सब आराम से पडे हुए हैं, कोई गती ही नहीं है..सब जडवत हैं..अब तो उन्हे चिंता हो गयी, इतनी मेहनत से रचना कि लेकीन अभिकल्पना पे पानी फ़िरता नजर आ रहा था.
अब क्या करें, थोडी देर दिमाग लगाया किंतु कुछ समझ नहीं आया..
फ़िर उन्होने अभीयंता विश्वकर्मा को बुलाया और पुछा कि ये जो मैने रचना कि है इतनी मेहनत से इसमें क्या त्रुटी रह गयी है, कुछ काम क्यों नहीं कर रहा..
विश्वकर्मा ने निरिक्षण-परिक्षण किया फिर कहा कि प्रभु इन प्राणीयों मे कोई ऐसा यंत्र नहीं है जो इन्हे कार्य करने के लिये उद्वित करे सो कुछ ऐसा यंत्र लगाईये कि सब उस यंत्र के प्रभाव से काम करना शुरु करें,
ब्रम्हा ने कहा तुम ही कोइ सुझाव दो..
फिर विश्वकर्मा ने मुझे बना कर सभी प्राणीयों मे लगा दिया.
कुछ ही क्षण बिते होंगे कि सम्पुर्ण जगत चलायमान हो गया..
आशा है कि आप अब तक मुझे पहचान गये होंगे..
जी, मैं हूँ आपकी अपनी भुख,चाहो जिस संज्ञा से सम्बोधित कर लो..
सोच के देखो, आज जो भी हो रहा है, या कहो कि होता है, या होता आ रहा है, कही न कही से मैं ही उसकी कारक हूँ,
सुकर्म से लेके दुस्कर्म तक, सभी कारणों का कारक मैं ही हुँ..
गण से गणतंत्र तक सभी मेरे प्रभाव से प्रभावित हैं..
अपने विषय मे कुछ और तथ्यों को ले कर मै जल्द ही प्रस्तुत होउँगी,
तब तक के लिये आज्ञा दें
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