अब और खामोश नहीं
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Poem
by Rishabh Makrand
याद करता हूँ उन कुछ लम्हों को,
जिया था जिनको शायद जिंदगी की तरह,
छुपाना चाहता था सबसे,शायद ख़ुद से भी कभी,
जुबान आज भी रोकती है..दिल कहता है..बस अब बस..
अब और खामोश नहीं...
बहुत मनाया,समझाया..
इस नादाँ दिल को..जाने दो...
जो हुआ सो हुआ...
वो एक लम्हा थे..रहगुजर नही...यादें दे कर जो गुजर गए..
इसमे उनका कोई दोष नही...
थक गया हूँ इस कल, आज और कल की इस सोच से..
क्या करना चाहिए था, क्या किया..और क्या करना है...
हर पल की इस वेदना से...
नही संभाल पाया कुछ नाजुक रिश्तों को..
गलतियाँ हुई मुझसे भी बहूत..
मुझे उनका अफ़सोस नही...
जीना चाहता हूँ फिर से...
अपने आप को..बचे हुए कुछ पलों को...
जिंदगी की तरह..
एक बार फिर..
बहना चाहता हूँ समय के इस धारा में..मनमौजी...
क्या, क्यों, कब, कैसे करूँगा..
ये अब भी मुझे होश नही...
बस अब बस..
अब और खामोश नहीं...
जिया था जिनको शायद जिंदगी की तरह,
छुपाना चाहता था सबसे,शायद ख़ुद से भी कभी,
जुबान आज भी रोकती है..दिल कहता है..बस अब बस..
अब और खामोश नहीं...
बहुत मनाया,समझाया..
इस नादाँ दिल को..जाने दो...
जो हुआ सो हुआ...
वो एक लम्हा थे..रहगुजर नही...यादें दे कर जो गुजर गए..
इसमे उनका कोई दोष नही...
थक गया हूँ इस कल, आज और कल की इस सोच से..
क्या करना चाहिए था, क्या किया..और क्या करना है...
हर पल की इस वेदना से...
नही संभाल पाया कुछ नाजुक रिश्तों को..
गलतियाँ हुई मुझसे भी बहूत..
मुझे उनका अफ़सोस नही...
जीना चाहता हूँ फिर से...
अपने आप को..बचे हुए कुछ पलों को...
जिंदगी की तरह..
एक बार फिर..
बहना चाहता हूँ समय के इस धारा में..मनमौजी...
क्या, क्यों, कब, कैसे करूँगा..
ये अब भी मुझे होश नही...
बस अब बस..
अब और खामोश नहीं...

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