आदमी!! तुम कितना गिर सकते हो?
आदमी!!! एक सवाल था तुमसे...
तुम कितना गिर सकते हो?
देखा है पेड के पत्तों को, पतझड मे धरती पर गिरते हैं..
उनके गिरने का एक मौसम, एक समय होता है..
वो अपनी मर्जी से नहीं गिरते, कुछ प्रयोजन होता है..
तुम्हारे गिरने के पिछे क्या प्रयोजन ?
तुम कितना गिर सकते हो?
देखा तो तुमने, उस झरने को भी होगा..
जिसका पानी भी धरती पर गिरता है..
पत्थर के सिने को भी फ़ाडने कि ताकत होती है उसमे..
पर, गिर के भी वो अपनी शीतलता नहीं खोता..
तुमने सोचा है,गिरने पर तुम क्या खोते हो?
तुम कितना गिर सकते हो?
बुरायी गिरने मे नहीं..
गिरने कि नियत मे है..
क्योंकि जो गिरते हैं वो उठ सकते हैं...
परन्तु जिन्हे गिरने का आभास ही ना हो.. उन्हे क्या कहें...
मुझे बता दो...
ऐ आदमी..तुम कितना गिर सकते हो?
--ॠ
तुम कितना गिर सकते हो?
देखा है पेड के पत्तों को, पतझड मे धरती पर गिरते हैं..
उनके गिरने का एक मौसम, एक समय होता है..
वो अपनी मर्जी से नहीं गिरते, कुछ प्रयोजन होता है..
तुम्हारे गिरने के पिछे क्या प्रयोजन ?
तुम कितना गिर सकते हो?
देखा तो तुमने, उस झरने को भी होगा..
जिसका पानी भी धरती पर गिरता है..
पत्थर के सिने को भी फ़ाडने कि ताकत होती है उसमे..
पर, गिर के भी वो अपनी शीतलता नहीं खोता..
तुमने सोचा है,गिरने पर तुम क्या खोते हो?
तुम कितना गिर सकते हो?
बुरायी गिरने मे नहीं..
गिरने कि नियत मे है..
क्योंकि जो गिरते हैं वो उठ सकते हैं...
परन्तु जिन्हे गिरने का आभास ही ना हो.. उन्हे क्या कहें...
मुझे बता दो...
ऐ आदमी..तुम कितना गिर सकते हो?
--ॠ

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