रामचरितमानस कि सिख
कक्षा मे गुरु जी ने रामचरितमानस का पाठ पुर्ण किया..
आदतवस उन्होने कक्षा से प्रश्न किया..
बच्चों!!! तुम्हे रामचरितमानस से क्या सिख मिली..
कक्षा मे सन्नाटा छा गया...सभी सत्भध थे..तभी पिछे कि पंक्ती से एक छात्र ने अपना हाथ उठाया...
गुरुजी बहुत प्रसन्न हुए..चलो... एक ने तो उनकि मेहनत को परिणाम तक पहूँचाया..बोले..
खडे हो कर पुरी कक्षा को बतावो...
छात्र ने कहा...गुरुजी ...मेरी अबोधता को क्षमा करें.. मुझे रामचरितमानस से दो सिख मिलि...
गुरुजी काफी प्रसन्न हुए..सोचा.. जहाँ छात्र एक भी नहीं बता रहे हैं..ये दो बता रहा है..
छात्र बोला..पहली शिक्षा तो ये कि..अपने से सोचे विचारे बिना अपने माता-पिता कि बात नहीं माननी चहिये...अब देखिये ना गुरुजी..राम ने अपने माता-पिता कि बात मानी..अपनी भार्या(सीता) को और अपने भाई लक्ष्मण को अपने साथ वनवास का भागी बनाया..भातीं प्रकार के कष्ट हुये..अन्ततः ये जानते हुए भी कि उनकि भार्या अग्नी कि तरह पवित्र हैं..उसका परित्याग करना पडा...पलतः उन्होने लव-कुश के प्रती अपने पित्र-धर्म कि मर्यादा का पालन नहीं किया..अतः उन्हे मर्यादा-पुरुषोत्म कि उपाधी से सम्बोधित करना सर्वथा अनुचित है..
गुरुजी आवाक रह गये..इस से पहले कि वो कुछ कह पाते..
छात्र ने आगे कहा...दुसरी..
महाकवि तुलसीदास स्त्री-विरोधी थे..उनकि पत्नी ने उनका परित्याग किया फलतः उन्होने रामचरितमानस कि प्रत्येक नायिका को वेदना मे प्रस्तुत किया है..चाहे वो सिता हो..उर्वशि..कौशल्या..कैकयि..मन्थरा..मन्दोदरि..प्रत्येक को उन्होने वेदना और विरह मे ही चित्रित किया है...
छात्र ने आगे कहा...
गुरुजी मुझे ये नहीं पता कि राम या महाकवि तुलसीदास का प्रादुर्भाव इस धरती पर हुआ था या नहीं.. परन्तु आपने जिस रामचरितमानस का वर्णन हम लोगों से किया है..उस से मुझे यही शिक्षा मिली..
यह कह कर वो छात्र बैठ गया...
गुरुजी विचलित थे...उन्होने कक्षा से अपने निकास को ही उचित समझा...
क्या सच मे उस छात्र के कुतर्क मे कुछ तर्क था...
आपका..
ॠषभ

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