एक अखबार की दिनचर्या

posted under , , by Rishabh Makrand
मैं अखबार हूँ...
जी हाँ..वही जो आपके घर के बाहर आहाते मे एक सायकिल वाला रोज फ़ेक जाता है..
आप मे से कुछ कि दिनचर्या तो मुझसे ही शुरु होती है..परन्तु..अब मेरी दिनचर्या के बारे मे क्या कहूँ आप से..
जितने तरह के "बुध्धीजिवि" आपके समाज मे पाये जाते हैं.. उतने तरह कि मेरी दिनचर्या होती है..
चलिये, मेरे साथ एक से मैं आपको अवगत करवाता हूँ...बाकी लोगों से भी कभी मिलवा दूँगा..
ये गिरा मैं पहले माले की बालकनी मे..(गिरते हुए)..यहाँ कुछ अविवाहित लोग रहते हैं..3 लोग रहते हैं यहाँ..
ठाक...
पहलाः पेपर आ गया क्या?
दुसराः हाँ शायद, उठा के ला ना..नहीं तो अभी मालिक(तिसरा) ले के "बैठ" गये तो फिर नहीं मिलने वाला...

पहला उठता है..(मुझे हाथ मे ले कर) हम्म्म्म..क्या खबर लाये हो भाई..
मैं(सोचते हुए): खबर पढने से पहले अपना मुँह-हाथ तो धो लेते जनाब..उफ़्फ़......क्या बदबु है..
कुछ देर बाद...
पहला(दुसरे से): ले भाई कुछ खास नहीं है..वही मिडिया मसाला है..
(मन मे)मसालेदार
तो ये अनुपूरक (supplement) होगा..ये ...किसकि फोटो छपी है..हम्म्म..दीवार पे अच्छी लगेगी..
बस फिर क्या था..जनाब ने कैंची उठायी और कतर दिया मुझे एक तरफ़ से...

दुसरे ने भी मुझे कुछ देर हाथ मे लिया..2-4 पन्ने पलटे..वाणिज्य के पन्ने पे कुछ देर ठिठके..शायद किस मे निवेश करें सोच रहे थे..फिर मुझे समेटा और एक कोने मे(जहाँ बदबुदार मोजे पडे थे..)वहाँ डाल दिया...

अरे कोइ तो इस मुक कि सुनो...मेरा दम घुट रहा है.. मुझे यहाँ से हटा लो...

भगवान ने शायद सुन ली.. तिसरा भी आँख मलते हुये आया.. मुझे उठाया..और अपने कमरे कि तरफ़ मुडा..
सच कहूँ तो ये मेरे लिये फ़रिश्ता बन कर आया था..चलो..जान मे जान आयी..
अरे.. पर ये मुझे कहाँ ले के जा रहा है..नहीं...(सोचते हुए).. किसी ने सच कहा है.. आसमान से गिरे खजुर पे अटके..
आप सही समझे,ये भाई साहब मुझे आपने साथ गुसलखाने ले आये..इनके हाव-भाव से तो यही लग रहा है कि अब आराम से 20-25 मिनट मुझे ये बदबु भी बर्दास्त करनी होगी...
तकरीबन 20 मिनट बाद...इन्होने हाथ धोये...और मुझे उन्ही शौच वाले गिले हाथों उठाया..और अपने कमरे के एक कोने मे डाल दिया..
पहले से यहाँ काफ़ी राहत थी...
कभी कभी संतोष/चैन कि अपेक्षा करना भी अधिक जान पडती है...

कुछ समय बाद सभी मुझे छोड कर अपने-अपने कार्यों मे व्यस्त हो गये...उपर चलते हुए पंखे ने मेरे पन्नों को इधर-उधर फ़ैला दिया..मैं भी फ़ैल के सोता रहा शाम तक...

शाम मे वापस आते वक्त एक कि चप्पल टुट गयी..बेचार लंगडते हुए आ रहा था..
सच कहूँ तो मुझे अच्छा नहीं लग रहा था उसका लंगडना देख कर, तरस आ रहा था मुझे..
अचानक, उसने मुझ पर बिना तरस खाये..मेरे एक बाजु को फ़ाडा...चप्पल लपेटी और चला गया पास कि मोची कि दुकान पर..
जिसके लंगडेपन का मैं शोक कर रहा था वही मुझे लुला कर गया....
हाय रे दुनिया...

रात हुई,सभी खाने बैठे... घर मे दस्तरखान नहीं था तो मुझे ही बिछा कर बैठ गये, खाना भी मुझ पर ही रख दिया..खाया भी मुझ पर ही..गिराया भी मुझ पर ही...
और सब होने के बाद, मुझमे जुठन लपेट कर फ़ेक दिया मुझे पिछे कि सडक पर...

रात हो चुकी है, मुझे ठंड भी लग रही है..लेकिन इतनी रात गये मेरा क्या होगा.. या तो कल सुबह मुझे वो कचरा चुनने वाला बच्चा उठा ले जायेगा, या आज रात ही कोइ मुझे अग्नी को समर्पित कर के अपनी इस ठंड से रक्षा कर लेगा...

आज के लिये इतना ही..मिलूँगा कभी इसी तरह सडक के किनारे..
तब तक के लिये आज्ञा दें

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