धुँआ..

posted under , , by Rishabh Makrand
धुँआ...
धुँआ होम का हो, या व्योम का,
आग से हो, या राख से,
नहीं करता वो अटखेलियाँ हवा के साथ,
ना ही दिखाता है वो करतब लुभावने,
उमडता-घुमडता रहता है, अपने आप
मे
सच तो ये है कि वो जलता है, ना जाने किस विछोह के संताप मे...

धुँआ...
लिपटना चाहता है, एक आखिरी बार,
हर एक उस लौ से, जो ईठलाती है, बलखाती है,
अपने उन्माद मे,
पर
धुँआ...
जलता है,शायद उस लौ से विछोह के संताप मे...

धुँआ...
सिखाता है आत्मदान करना..
अपने अस्तीत्व पर, ना कभी अभिमान करना,
सिखाता है वो हमेसा उपर उठना.,
व्यापक रुप से व्याप्त करना अपने आप को इस संसार मे.,
फ़िर भी
वो जलता है,ना जाने किस विछोह के संताप मे...

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